यह घोषणापत्र अर्पित है उन भारतीय नागरिकों व सैनिकों को- जो एक मुर्दा क़ौम में रहते हुए भी- खुद को जिन्दा समझते हैं!

बुधवार, 5 अक्तूबर 2016

अध्याय- 21: ”जनसंसदों“ का गठन


21.1   प्रखण्ड/नगर/उपमहानगर स्तर पर जनसंसदकायम की जायेगी।
21.2   जनसंसद में कुल चार पक्ष होंगे-
       (क) स्थानीय न्यायाधीशों का पक्ष, जो जनसंसदों की अध्यक्षता करेंगे- कुल 5 न्यायाधीशों की एक पंचायतबनायी जा सकती है इसके लिए;
       (ख) पंचायतों/वार्डों के जनप्रतिनिधियों का पक्ष, जो प्रखण्ड/नगर/उपमहानगर के सर्वांगीण विकास के लिए मिलजुल कर योजनायें बनायेंगे;
       (ग) स्थानीय प्रशासन के सभी सरकारी अधिकारियों- चाहे वे राज्य सरकार के हों, या राष्ट्रीय सरकार के- का पक्ष, जो योजनाओं की प्रगति तथा खर्चों का हिसाब देंगे; और
       (घ) जागरुक नागरिकों का पक्ष, जो व्यक्तिगत या स्थानीय समस्याओं को उठा सकेंगे, जनप्रतिनिधियों तथा सरकारी अधिकारियों से सूचना माँग सकेंगे, उनसे सवाल कर सकेंगे और कोई प्रस्ताव पेश कर सकेंगे।
21.3   जनप्रतिनिधियों के चयन के लिए बाकायदे चुनाव होंगे, जिसमें प्रत्येक पंचायत/वार्ड से कुल 6 जनप्रतिनिधियों को चुना जायेगा, जिनमें से 2 महिलाओं तथा 2 निम्न आयवर्ग के प्रतिनिधियों का होना अनिवार्य होगा (ताकि भविष्य में जनसंसद सामन्तवादीया पुरुषवादीसंस्था न बन सके)।
21.4   प्रत्येक पंचायत/वार्ड के नागरिक प्रतिवर्ष अपने 6 में से 2 जनप्रतिनिधियों को बदल सकेंगे- अर्थात् प्रतिवर्ष 2 सीटों के लिए चुनाव होंगे- पहले वर्ष सामान्यश्रेणी के जनप्रतिनिधियों के लिए; दूसरे वर्ष महिलाश्रेणी तथा तीसरे वर्ष निम्न आयवर्गश्रेणी के प्रतिनिधियों के लिए। (इस प्रकार, जनसंसद कभी न भंग होने वाली संस्था होगी; ज्यादा-से-ज्यादा नागरिकों को राजनीति में आने का अवसर मिलेगा और अकर्मण्यजनप्रतिनिधियों से नागरिक जल्दी ही छुटकारा पा सकेंगे।)
21.5   जिन क्षेत्रों में जनसंख्या का घनत्व ज्यादा है, वहाँ प्रत्येक पंचायत/वार्ड से 6 के स्थान पर 9, 12, 15 या 18 जनप्रतिनिधी चुने जा सकेंगे- फार्मूला यह हो सकता है कि लगभग 300 मतदाताओं पर 1 जनप्रतिनिधि जरूर हों- ऐसे में, प्रतिवर्ष क्रमशः 3, 4, 5 या 6 जनप्रतिनिधि (एक तिहाई) बदले जायेंगे।
21.6   जनसंसद के वर्ष में 6 सत्र आयोजित होंगे- हर दूसरे महीने के पहले हफ्ते में और हर सत्र कम-से-कम एक सप्ताह का होगा।
21.7   जनसंसद के मुख्य रुप से निम्न तीन कार्य होंगे-
       (क) स्थानीय स्तर की योजनायें बनाना तथा उन्हें अपनी निगरानी में सरकारी महकमों के माध्यम से लागू करवाना;
       (ख) राज्य स्तरीय, या राष्ट्रीय/अन्तर्राष्ट्रीय, या फिर सम्पूर्ण मानवता की भलाई के लिए प्रस्ताव लाना, चर्चा के बाद उसे पारित करना और फिर स्थानीय विधायक/सांसद के माध्यम से उन्हें विधानसभा/संसद में पेश करवाना; और
       (ग) विधानसभा/संसद में जो प्रस्ताव पारित न हो पाये, उनपर चर्चा करना; प्रस्ताव महत्वपूर्ण एवं संवेदनशील हो, तो उसपर जनमत-सर्वेक्षणकरवाना और फिर अन्तिम रुप से उसपर जनसंसद की सहमति या असहमति के साथ उसे वापस विधानसभा/संसद को लौटाना।
21.8   अधिवेशन के अध्यक्ष, यानि न्यायाधीशों की पंचायतों को इतना (विवेक-) अधिकार प्राप्त होगा कि जनसंसद के अधिवेशन को गम्भीरता से न लेने वाले तथा आम जनता की जरुरतों को पूरा करने में लापरवाह अधिकारी/जनप्रतिनिधि को वे छह महीनों तक के लिये निलम्बित कर सकेंगे।
21.9   कुल मिलाकर यही कहा जा सकता है कि प्रखण्ड/नगर/उपमहानगर के सर्वांगीण विकास के लिये स्थानीय नागरिक स्वयं योजनाएँ बनायेंगे, सरकारी महकमों के माध्यम से उन्हें लागू करवायेंगे और यह सब कुछ न्यायपालिका के संरक्षण में होगा।
21.10  राष्ट्रीय सरकार सभी प्रखण्डों को बराबर-बराबर विकास धनराशि मुहैया करायेगी, जबकि राज्य सरकारें जनसंसदों द्वारा पारित विकास योजनाओं के आधार पर धन मुहैया करवायेगी।

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