यह घोषणापत्र अर्पित है उन भारतीय नागरिकों व सैनिकों को- जो एक मुर्दा क़ौम में रहते हुए भी- खुद को जिन्दा समझते हैं!

बुधवार, 5 अक्तूबर 2016

अध्याय- 46: तीव्र एवं सस्ती न्यायिक प्रक्रिया


46.1        राष्ट्रपति महोदय के विरुद्ध अभियोग लाने से पहले विधायिका प्रमुख (प्रधानमंत्री), न्यायपालिका प्रमुख (सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश) और कार्यपालिका प्रमुख (मुख्य चुनाव आयुक्त को कार्यपालिका प्रमुख का दर्जा दिया जाएगा) की सहमती अनिवार्य होगी; इसी प्रकार, इन तीनों प्रमुखों के विरुद्ध अभियोग लाने से पहले राष्ट्रपति महोदय की अनुमति अनिवार्य होगी- बाकी इस देश में किसी के भी खिलाफ अभियोग लाने/मुकदमा शुरू करने से पहले किसी से भी, किसी भी किस्म की, अनुमति या सहमती लेने की जरुरत नही रहेगी।
46.2        किसी भी व्यक्ति को उसके जीवनकाल में अधिकतम 3 बार जमानत दी जा सकेगी।
46.3        ‘अग्रिमजमानत की प्रथा समाप्त की जायेगी।
46.4        न्यायाधीशों के पास फर्जीमुकदमों तथा (मुकदमों को लटकाने के उद्देश्य से उठायेजाने वाले) गौणमुद्दों को खारिज करने का विवेकाधिकारहोगा।
46.5        किसी भी मुकदमे में सिर्फ और सिर्फ यह देखा जायेगा कि अभियुक्त दोषी है या नही“; अन्यान्य मुद्दों पर अदालत का समय नष्ट नहीं होने दिया जाएगा।
46.6        जहाँ सबूत पक्के नहीं होंगे, गवाह संदिग्ध होंगे, या शासन/प्रशासन/पुलिस की ओर से अभियुक्त को बचाने के प्रयास का सन्देह होगा, वहाँ न्यायालय परिस्थितिजन्य साक्ष्योंके आधार पर फैसले लेने के लिए स्वतंत्र होंगे।
46.7        जिला न्यायालय के समान प्रखण्ड स्तर पर प्रखण्ड न्यायालय स्थापित किये जायेंगे- दोनों का स्तर बराबर होगा और दोनों ही उच्च न्यायालय के अधीन होंगे।
46.8        विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका, सेना और अर्द्धसैन्य बलों के अन्दरुनी मामलों की सुनवाई के लिए अलग से राजकीय अदालतका गठन किया जायेगा, जिसमें इन सबके लिए अलग-अलग प्रकोष्ठ होंगे।
46.9        सभी अदालतें 90 दिनों के अन्दर किसी एक मामले को निपटायेगी; जिन मामलों में ऐसा सम्भव नही होगा, उन्हें अन्तरिम फैसले, सुझाव या सिफारिश के साथ 91वें दिन उच्चतर अदालत में स्थानान्तरित कर दिया जायेगा।
46.10      कोई भी उच्चतर अदालत- सर्वोच्च न्यायालय भी- अपने अधीनस्थ अदालतों में चल रहे मामलों में 90 दिनों तक दखल नही दे सकेगी।
46.11      दो साल से अधिक पुराने मामलों को निपटाने के लिए 5-5 न्यायाधीशों की न्यायिक पंचायतोंका गठन किया जाएगा, जिसमें मामले के सभी पक्षोंसे सीधी बातचीतके बाद सामान्य विवेकसे निर्णय लिये जायेंगे। (न्यायिक पंचायतों के लिए अवकाशप्राप्त न्यायाधीशों की भी सेवा ली जा सकेगी।)
46.12      कुछ गम्भीर किस्म के मामलों- जैसे, राष्ट्रीय सुरक्षा, आतंकवाद, मादक द्रव्य व्यापार, पर्यावरण-संरक्षण इत्यादि के लिए कोर्ट-मार्शल-सरीखी एक संक्षिप्त अदालती प्रक्रिया विकसित की जायेगी।
46.13      सम्मनों की अवहेलना, (मजिस्ट्रेट के सामने दिये गये) बयान से मुकरना और फरारी को दण्डनीय अपराध बनाया जाएगा।
46.14      जनता (मुवक्किल) से फीस न लेने वाले और इस आशय का शपथपत्र दाखिल करनेवाले वकीलों को सरकारी वेतन दिया जाएगा। (वकील जब चाहे, सरकारी वेतन छोड़कर फीस लेना शुरू कर सकेंगे।)

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