यह घोषणापत्र अर्पित है उन भारतीय नागरिकों व सैनिकों को- जो एक मुर्दा क़ौम में रहते हुए भी- खुद को जिन्दा समझते हैं!

शुक्रवार, 7 अक्तूबर 2016

प्रस्तावना


       प्रस्तावना के रुप में यहाँ दैनिक प्रभात खबरमें प्रकाशित कुछ चिन्तक-विचारकों, विद्वान-बुद्धिजीवियों के कथनों को कृतज्ञता सहित उद्धृत किया जा रहा है- एक उद्धरण दैनिक जनसत्तासे भी है। हालाँकि ये कथन अलग-अलग समय पर अलग-अलग विषयों पर व्यक्त किये गये हैं, मगर एक के बाद एक जोड़कर सामने रखने के बाद ये कथन इस घोषणापत्र के लिए प्रस्तावना का काम करते हैं:
       सड़े हुए पुरातन से चिपके रहना मोह है मित्रों! चारों तरफ से दुर्गन्ध आ रही है। समाज-व्यवस्था हो, शासन-व्यवस्था हो, शिक्षा-व्यवस्था हो, चिकित्सा व्यवस्था हो। हर तरफ से सड़ान्ध की बदबू आ रही है। यहां तक कि रिश्तों से भी, परिवार और परिवार के सदस्यों से भी। कितना भी ढकने-दबाने-छिपाने का प्रयास करो, सड़ी हुई भ्रष्ट व्यवस्था सभी सीमाओं को पार कर हमारी आँखों के सामने स्पष्ट है।
       समाज की धरती सड़ चुकी है। पुराने की अच्छाई मर चुकी है। गन्दगी बच गयी है सिर्फ, जो जहर घोल रही है। विषाक्त कर रही है वातावरण को। विजनके अभाव में इस सड़े हुए पुराने से कॅम्प्रोमाइजेजकर हम काम चला रहे हैं। वह भी किसी तरह।
       तोड़ने के लिए तोड़ना सेन्सलेस डिस्ट्रक्शन है, निरर्थक संहार है। लेकिन नया बनाने के लिए पुराने को तोड़ना निर्माण है, सृजन की प्रक्रिया है। नया बने, तो पुराना टूटेगा ही। लेकिन यह टूटना मीनिंगफुल है, सेन्सिबल है। तोड़ने के उपकरण अलग होते हैं, बनाने के अलग। ताकत दोनों में चाहिए। तोड़ने और बनाने, दोनों में ताकत की जरूरत पड़ती है। लेकिन बनाने के लिए जिस चीज की सबसे ज्यादा जरूरत होती है, वह है विजन, नये की रूपरेखा। अगर आपका विश्वास हो कि तोड़ने के लिए नहीं तोड़ा जा रहा, बनाने के लिए तोड़ा जा रहा, तो हमको, आपको और सारे समाज को यह काम करना चाहिए। अपना तात्कालिक फायदा देखने की आदत बहुतों को है। इसलिए पुराने से चिपके रहने में जिन्हें फायदा है, वे तो तोड़ने का विरोध करेंगे ही।
       और अगर नयी व्यवस्था से साधारण निरीह लोगों को फायदा होनेवाला हो, तो वे थोड़े-से लोग, जिनके हाथ में सत्ता है, धन-सम्पत्ति केन्द्रित है, विरोध करेंगे ही।
       अभी हाल में ही इण्टरनेटपर पढ़ा कि मात्र पच्चासी लोग पृथ्वी की आधी सम्पत्ति के मालिक हैं। विश्व की प्रसिद्ध डेवलपमेण्ट संस्था ऑक्सफैमकी रिपोर्ट है यह। शीर्षक है- वर्किंग फॉर द फ्यूचर। जिस व्यवस्था के फलस्वरूप ऐसा असन्तुलन (इम्बैलेन्स) खड़ा हुआ है, उसे तो मुहूर्त भर के लिए भी सहन नहीं करना चाहिए। जड़ से निर्मूल कर, उखाड़ कर ऐसी व्यवस्था को फेंक देनी चाहिए कि भविष्य में दुबारा ऐसी गलती हमसे न होने पाये।
       1947 का अनफिनिश्ड एजेण्डा है मित्रों। उस समय आजादी की लड़ाई से थके-मांदे लोग पुराने को ही स्वीकार कर, दक्षिण एशिया की अपनी सामाजिक विशिष्टताओं की उपेक्षा कर तात्कालिक सन्तुष्टि को ही प्राथमिकता दे बैठे। नये के निर्माण की जद्दोजहद नहीं उठा सके। शायद थक गये थे वे लोग।
       आजादी की लड़ाई थकाने वाली हो गयी थी। गांधी-विनोबा की बातें भी अनसुनी हो गयी। 1952 के प्रथम आम चुनाव ने नरेन्द्रदेव, जयप्रकाश, लोहिया, रामनन्दन-जैसे परिवर्तन के नायकों को रिजेक्ट कर दिया था। सोशलिस्ट पार्टी, जिसके पास नये का विजन-डॉक्युमेण्ट था, रिजेक्ट हो चुकी थी। तब से 66 साल बीत चुके हैं। हम कॅम्प्रोमाइजेज करते गये। अपने संविधान और व्यवस्था में चिप्पियाँ लगाते गये। लेकिन मौलिक रूप से ढाँचा वही पुराना था।
       नयी समाज-व्यवस्था, नयी शासन-व्यवस्था, नयी शिक्षा-व्यवस्था, सब कुछ नया। पुराने को अलविदा कहना ही होगा मित्रों। पुराना अब किसी काम के लायक ही नहीं रहा। इतना ही नहीं, पुराना जहर घोल रहा है।
       सब कुछ नया हो, मंगलकारी हो सबके लिये, इसका उत्साह आपके दिल में हो मित्रों। पुराने को तोड़ कर नया बनाने के लिए विश्वास की जरूरत होगी और आवश्यकता पड़ेगी आपसी भाईचारे की, प्रेम-स्नेह और संवेदनशीलता की। जगत का नाथ जगन्नाथ हमारे अन्तर में हो, तो उसकी ताकत के सहारे हम नया बना लेंगे।
       और, सिर्फ अपने समाज, देश को बदलने की बात नहीं, सिर्फ अपने यहाँ नये को निमंत्रण देने की बात नहीं है। विनोबा का नारा था थिंक ग्लोबली एक्ट लोकली। अपना घर नया कर लें। फिर पूरी दुनिया बदलनी होगी न। शेष दुनिया भी तो नया खोज रही है मित्रों।
       लेकिन, फिलहाल अपना घर, अपना समाज, अपना देश। नये प्रारूप को अपने यहां स्थापित कर लें। फिर पूरी दुनिया को देंगे वह प्रारूप। पुराना तोड़े बिना नया बनता नहीं। पुराने से मोह न करें मित्रों, वह सड़ चुका है।
       (आध्यात्मिक चिन्तक, तपस्वी, प्रचार से नितान्त दूर, अकेले साधना में लगे उदय राघव जी के विचार दैनिक प्रभात खबरमें दिनांक 2 अप्रैल 2014 को प्रकाशित हुए थे। वहीं से उद्धृत।)
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       मौजूदा अर्थव्यवस्था उपभोग पर आधारित है। लोग सोचते हैं कि और अच्छा जीवन हो, सारी सुख-सुविधायें मिलें, भले ही पर्यावरण पर और दूसरों पर इसका प्रतिकूल असर पड़ता हो।
       ऐसे हालात को बदलने के लिए ही एक वैकल्पिक मॉडल की जरूरत है, जिसमें उपभोक्तावाद न हो। भारत ही ऐसा देश है, जो यह मॉडल दे सकता है।
       भारत, चीन, ब्राजील- जैसे बड़े देशों में सिर्फ भारत के पास ही वैकल्पिक आर्थिक मॉडल देने की क्षमता है। भारत में इतने संसाधन हैं कि यहाँ सभी को बुनियादी सुविधा मिल सकती है। इससे वैश्वीकरण के दौर में भारत अलग-थलग नहीं पड़ेगा।
       आज आयात काफी अधिक क्यों है, क्योंकि हम फिजूलखर्ची कर रहे हैं। देश में पब्लिक ट्रांसपोर्ट सिस्टम पर्याप्त नहीं है। लोग निजी कार की बजाय पब्लिक ट्रांसपोर्ट का इस्तेमाल करने लगें, तो पेट्रो-पदार्थ की खपत दस गुनी कम हो जायेगी।
       पूरी लोकतांत्रिक प्रणाली अत्यंत महँगी होती जा रही है। विधायकों और सांसदों की विलासित बढ़ती जा रही है। नेताओं की सुरक्षा पर खर्चे बढ़े हैं। अरबपति सांसदों की संख्या बढ़ रही है। राजनीतिक दलों को हजारों करोड़ रुपये के चन्दे मिल रहे हैं। यह धनतंत्र है या लोकतंत्र? धनतंत्र के सहारे देश का भला कैसे हो सकता है?
       भारत में राजनेता अपने-आप को शासक मानते हैं, जबकि यूरोप तथा अमेरिका में नौकरशाह और राजनेता खुद को पब्लिक-सर्वेण्ट मानते हैं।
       पूरी व्यवस्था कुछ लोगों के हाथों में सिमट गयी। देश में संभ्रान्त वर्ग केन्द्रित नीति अपनायी गयी। इससे संसद में करोड़पति सांसद आने लगे। राजनीतिक पार्टियाँ अमीरों का संगठन बन कर रह गयीं।
       असल में, विकास का मौजूदा मॉडल सही नहीं है। यह लोकतंत्र नहीं, बल्कि धनतंत्र है। इसी धनतंत्र के कारण नक्सलवाद फैल रहा है। सत्ता के लिए आम लोगों की बुनियादी जरूरतों की बजाय कॉरपोरेट के हित महत्वपूर्ण हो गये हैं....
       मौजूदा शासन प्रणाली और सोच को बदलने की जरूरत है।
       (जे.एन.यू. के प्रोफेसर अरूण कुमार का विस्तृत साक्षात्कार 3 अगस्त 2013 के प्रभात खबरमें प्रकाशित हुआ था। उसी के कुछ अंश।)
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       "...एक-दो सौ सालों में विशाल नगरीय व्यवस्थायें ऊर्जा एवं पर्यावरण संकट की वजह से खत्म हो जायेंगी। आवागमन की व्यवस्था भी ध्वस्त हो जायेगी। ये चीन की दीवार और मिश्र के पिरामिड की तरह खण्डहर बनकर नुमाइश की चीजें बन जायेंगी।
       "...जिस तरह से औद्योगिक विकास हो रहा है, उससे अब किसी परमाणु युद्ध की जरुरत नहीं है। औद्योगीकरण ही विश्व को बर्बाद करने के लिए काफी है। पर्यावरण की जो स्थिति बन रही है, उससे कहीं-न-कहीं हमलोग उस स्थिति की ओर बढ़ते जा रहे हैं।"
       (7 जून 2012 के प्रभात खबरमें प्रकाशित वरिष्ठ समाजवादी चिन्तक सच्चिदानन्द सिन्हा के साक्षात्कार से उद्धृत।)
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       "कहीं आपने भारत के किसी दल या राजनीतिक खेमे में यह चर्चा सुनी कि इस देश को महान बनाने का दस्तावेज हमने तैयार किया है; हम इस राष्ट्रीय बहस चला रहे हैं; हम गाँव-गाँव जायेंगे, घर-घर जायेंगे और राजनीति में नयी इबारत लिखेंगे?
       "भारतीय राजनीति सड़ गयी है। इसकी मौजूदा लाश को तुरन्त दफना देना ही शुभ होगा। इसमें नयी हवा, नयी ऊर्जा चाहिए। नयी सृष्टि, नये विचार की ताकत चाहिए और नया खून चाहिए, तब शायद कहीं मौलिक ढंग से अपनी चुनौतियों को हम देख-समझ पायेंगे।"
       (7 अक्तूबर 2012 के प्रभात खबरमें सम्पादक हरिवंश जी ने लिखा था।)
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       हालाँकि लोग अक्सर चर्चा करते हैं कि जब देश में अधिकतर नेता भ्रष्ट हैं और अधिकतर पार्टियाँ प्राइवेट लिमिटेड कम्पनी में तब्दील हो चुकी हैं, तो जनता के पास विकल्प क्या होगा? विकल्पहीनता का प्रश्न भारतीय मानस को मथता रहता है। लेकिन एक सच यह भी है कि प्रत्येक का विकल्प हमेशा ही मौजूद रहता है, भले ही अवाम उसे पहचानने में देरी करे। कार्ल मार्क्स ने द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद की परिभाषा में लिखा है कि आदमी कुछ करे या नहीं करे, नियति चुपचाप बैठी नहीं रहती है। वह हमेशा घटनाओं के संघर्ष से कुछ न कुछ नया करती रहती है।मार्क्स की यह परिभाषा वैसे दम्भी दलों और नेताओं के लिए एक सबक है, जो समझते हैं कि उनका कोई विकल्प नहीं है!
       प्रचंड वेग से बहती धारा अपना रास्ता स्वयं खोज लेती है। इसी प्रकार, भारतीय राजनीति की कोई अनजान धारा सभी दम्भी विकल्पों को ध्वस्त कर दे, तो कोई आश्चर्य नहीं। और यही एक सच्चे लोकतंत्र की विशेषता भी है।
       (3 जनवरी 2013 के प्रभात खबरमें बिहार विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष गजेन्द्र प्रसाद हिमांशु जी का एक आलेख प्रकाशित हुआ था। उसी का अन्तिम पाराग्राफ है यह।)
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       इस देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था को अब वही कोई अगला प्रधानमंत्री बनाये रख सकता है, जो दृढ़ प्रशासक हो; जिसमें भ्रष्टाचार के प्रति शून्य सहनशीलता हो और जो विकास को ही अपनी राजनीति का मूल मंत्र बनाये। यदि ऐसा नहीं हुआ, तो धीरे-धीरे लोकतंत्र पर से आम जन का विश्वास पूरी तरह उठ जायेगा। जनता का जब लोकतंत्र से विश्वास उठता है, तो उसे तानाशाह ही अच्छा लगना लगता है।
       (22 अप्रैल 2013 के प्रभात खबरमें वरिष्ठ पत्रकार सुरेन्द्र किशोर।)
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       अब्राहम लिंकन के राष्ट्रपति बनते ही अमेरिका के दक्षिणी राज्यों ने स्वयं को अमेरिकी संघीय ढांचे से अलग करना शुरु कर दिया। राष्ट्रपति लिंकन ने अमेरिकी राष्ट्र को एकसूत्र में बाँधे रखने के लिए युद्ध पर जाने का निर्णय लिया। इस युद्ध के दौरान राष्ट्रपति लिंकन ने अपने पास लगभग सारे अधिकार केन्द्रित कर लिये। युद्ध के दौरान लिंकन ने सदन, न्यायालय, अन्य संवैधानिक प्रक्रिया-जैसी परम्पराओं की अवहेलना करने से भी परहेज नहीं किया। एक पत्र में राष्ट्रपति लिंकन ने लिखा- देश गँवा के संविधान बचाने का क्या औचित्य है?... शरीर बचाने के लिए एक अंग काटा जाता है लेकिन एक अंग बचाने के लिए पूरे शरीर को नष्ट नहीं किया जा सकता।
       ”एक जनवरी, 1863 में राष्ट्रपति लिंकन ने दासत्व मुक्ति घोषणाके द्वारा इस युद्ध में अमेरिका के एकीकरण के साथ ही गुलामी का समापन भी जोड़ दिया। 1864 में गृहयुद्ध के चरम पर भी राष्ट्रपति लिंकन ने चुनाव पर जाने का निर्णय लिया, जबकि राष्ट्रपति के सलाहकारों ने भी लिंकन के चुनाव हारने की आशंका जतायी थी। युद्ध के बीच एक राष्ट्रपति के रुप में असाधारण अधिकारों से सम्पन्न होते हुए भी लोकतांत्रिक व्यवस्था बनाये रखने के लिए चुनाव का निर्णय लेना राष्ट्रपति लिंकन के साहस और ईमानदारी का प्रमाण है।
       (4 अप्रैल 2014 के प्रभात खबरमें अब्राहम लिंकन पर एक लेख छपा था, जिसके लेखक थे- रविदत्त वाजपेयी। उसी लेख के दो पाराग्राफ।)
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       प्रसन्नता की बात है कि क्रोनी पूँजीवाद (चहेतों को लाभ पहुँचाने वाला यानि लँगोटिया पूँजीवाद) ज्यादा समय तक टिकता नहीं। क्रोनी पूँजीवाद से निबटने का रास्ता क्रान्ति का है। सरकार के सामने विकल्प है कि क्रोनी पूँजीवाद को स्वयं त्याग दे या फिर क्रान्ति का सामना करे।
       (22 जनवरी 2013 के प्रभात खबरमें प्रकाशित डॉ. भरत झुनझुनवाला के आलेख से उद्धृत।)
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       मैं तो केवल सर्वनाश देख सकता हूँ। भविष्य में क्या होगा, इसकी भविष्यवाणी नहीं कर सकता। पर समाज विचलित हो रहा है। जनता की नाराजगी बढ़ रही है। मेरा मानना है कि संसद वर्तमान स्थिति को रोकने की हालत में नहीं है। सभी पार्टियाँ इन नीतियों (उदारीकरण) की समर्थक हैं, और सांसदों में सड़क पर आने का दम नहीं है।
       मुझे तो लगता है कि एक लाख लोग अगर संसद को घेर लें, तो शायद कुछ हो।
       (30 जुलाई 1998 के जनसत्तामें प्रकशित वयोवृद्ध अर्थशास्त्री डा. अरुण घोष (अब दिवंगत) के साक्षात्कार से उद्धृत अंश।)
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       अन्त में, 29 जुलाई 2012 के प्रभात खबरमें प्रकाशित डॉ. एन.के. सिंह के आलेख आने ही वाला है धरती का टिपिंग प्वाइण्टका जिक्र, जिसमें बताया गया था कि धरती के 43 प्रतिशत जंगल समाप्त हो चुके हैं; 2025 तक 50 प्रतिशत जंगल समाप्त हो जायेंगे। इसके बाद हम चाह कर भी अपने पर्यावरण को पहले-जैसा नहीं बना पायेंगे। इसे वैज्ञानिकों ने 'Point to No Return' कहा है।
       यानि, हमारे पास समय ज्यादा नहीं बचा है!
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